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MY FIRST PERIOD JOURNEY





आज हम बात करने जा रहे है एक ऐसे टॉपिक के बारे में, जो एक औरत के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता हैं, पर यह औरत  के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होने के साथ साथ यह उनका सबसे दर्द भरा पल भी होता हैं, एक औरत अपना आधा जीवन इसी दर्द में गुजार देती है, मानते है आज का समाज बहुत आगे बढ़ चुका है, नई नई उपलब्धियां प्राप्त कर चुका है पर क्या हम यह कह सकते है की मासिक धर्म या पीरियड के लिए आज भी कुछ लोगो की सोच नही बदली है। मैं कुछ लोगों की या दूसरों की क्या बात कहूं, मेरे खुद के घर में मेरी मौसी, मेरी दादी, मेरी दीदी, ये सब है इनके भी विचार पीरियड के लिए बहुत अलग है, अगर पीरियड होता हैं तो हमारे यहां आज भी मंदिरों में जाने नही दिया जाता, भगवान को छूने नही दिया जाता,  पर इन सब को देख कर एक बात पता चलती है, की जो सबको मासिक धर्म के बारे में शुरू से ही बताया गया है की यह एक पाप है या एक गंदगी है, इस टाइम हमे भगवान को नही छूना है, हमे किचन नही छूना है वही चीज पुराने लोगो की वजह से आज भी है, कई घरों में लड़किया किचन में नही जाती क्यों?  क्योंकि उनकी मां ने मना किया है। मां से कहो की मां ऐसा क्यों तो मां का कहना है की चुप कर यह प्रथा है यही करना, नही छूना है कुछ।  क्यों ऐसा है?         

  क्योंकि  हम आज भी यह सब मानते है, दोस्तो हर 21 दिन बाद हर लड़की को इस दर्द का सामना करना पड़ता है। हास्य पात्र नहीं है यह, इसे महसूस करो, नाकि इस दर्द को कम करने के बजाय हम उसे गंदगी बता रहे है । मैं अपने पहले पीरियड की बात करना चाहूंगी जब मैं 8वीं  कक्षा में थी जब मुझे ये हुआ, मै जानती नही थी की ये मुझे क्या हो रहा है, मैंने उसे ध्यान नहीं दिया घर पर भी किसी को नहीं बताया, पर जब दूसरा दिन हुआ वो तब भी नही ठीक हुआ, मैं स्कूल गई उस दिन मैं एक जगह अपने बैंच पर बैठी रही, उस दिन मैं बहुत उदास थी कि मुझे ऐसा क्यों हो रहा है, आखिर यह है क्या? जैसे तैसे स्कूल का वह दिन खत्म हुआ मेरी स्कूल की छुट्टी हुई मैं जब खड़ी हुई सब की नजर बैंच पर थी, मेरे ऊपर के कपड़े में कुछ नही लगा था क्योंकि सब मेरी सलवार पर और बैंच पर लगा था मैं बाहर आई मैं वैसे ही उठकर अपनी साइकल पर बैठी और घर पर आई अपने कपड़े उतार कर जब मैंने पानी मे डाला इतना खून देख कर मैं डर गई, मम्मी नही थी मेरी, दीदी आई मैंने उसे बताया वो मुझे रूम में ले गई और कपड़े दिए ‘इसे लगाओ यह सबको होता है’ उस वक्त मैंने कहा की हां पर मुझे पहली बार हुआ है और मैं उदास हो गई, दीदी ने कहा  इसमें भगवान से दूर रहना  आचार नही छूना, अब तू बड़ी हो गई है। यह इतने नियम सुनकर मैंने उसे स्वीकार किया पर अब इतना कुछ बदलने के बाद मैं सोचती हूं, क्या सच में यह जो नियम बताया उसने मुझे, वह सच था? पर मुझे नही लगता की यह सच है, यह प्रकृति की देन कोई गंदगी नही है। इसके दर्द को देखो, एक औरत का इसके लिए किया गया संघर्ष देखो और मैं आने वाली पीढी से यही उम्मीद और निवेदन करती हूं कि  इस नियम से अपनी बेटी को ना बांधे बहुत तकलीफ होती है, जब उसे अलग व्यवहार किया जाता है मैं बहुत दुखी हूं की मेरे घर में अब भी ऐसा होता है, पर यकीन मानिए मेरी मम्मी जब इन बातो को लेकर  एक नई सोच रख सकती है, तो समाज क्यों नही आखिर क्यों नही बताया जा सकता है कि यह एक गंदगी नही है यह प्रकृति है जो एक औरत के हिस्से में आती है, जिसका हमे सम्मान करना चाहिए। हमारे स्कूलों में सब सब्जेक्ट के बारे में पढ़ाया जाता हैं फिर सिवाय इसके,  आज भी लोग इसके बारे में खुल के बात नही करते हैं, तो मेरे हिसाब से स्कूलों में इसके बारे में एक अलग से क्लास होनी चाहिए ताकि लड़किया आने वाले इस समय के लिए पहले से तैयार रहें।   

–MADHU DWIVEDI 

(GIVE RESPONSE )

                                     

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